रक्त धातु (Rakta Dhatu) – कार्य, रक्त क्षय, रक्त वृद्धि के लक्षण

by DR. HAMID HUSSAIN
रक्त धातु (Rakta Dhatu) - कार्य, रक्त क्षय, रक्त वृद्धि के लक्षण

पर्याय – असृक्, रुधिर, शोणित, खून, लहू

रक्त धातु की उत्पत्ति :- रस को धातुओं का मूल एवं रक्त को शरीर का मूल माना है, क्योंकि जीवन रक्त के अधीन होता है। समस्त धातुओं की उत्पत्ति का कारण अन्नरस एवं रस धातु होते हैं।

रसाद्रक्तं ततो मांस मांसान्मेद प्रजायते।
मेदोऽस्थि ततो मज्जः शुक्रं तु जायते॥ (सु. सू. 14/10)

रस से रक्त, रक्त से मांस, मांस से मेद, मेद से अस्थि, अस्थि से मज्जा एवं मज्जा से शुक्र की उत्पत्ति हुई है। क्षीर दधि न्याय या क्रम परिणाम पक्षानुसार जैसे दूध से दधि, दधि से मक्खन, मक्खन से घृत मण्ड बनता है। ठीक उसी प्रकार अन्तरस से रस धातु, रस धातु से रक्त धातु का निर्माण होता है।

तेजो रसानां सर्वेषां मनुजानां यदुच्यते ।
पित्तोष्मणाः स रागेण रसो रक्तत्वमृच्छति॥ (च. चि. 15/28)

अर्थात् मानवो में रस के तेजांश पर पित्त की ऊष्मा की क्रिया से पाक होने से रस रागत्व (लालिमा) को प्राप्त कर रक्त बनता है।

स खल्वाप्यो रसो यकृत्प्लीहानौ प्राप्य रागमुपैति ।
रञ्जितास्तेजसाः त्वापः शरीरस्थेन देहिनाम्॥
अव्यापन्नाः प्रसन्नेन रक्तमित्यभिधीयते। (सु. सू. 14/4-5)

अर्थात् देह धारियों के शरीर में रहने वाला आप्य (अन्नरस), यकृत एवं प्लीहा में पहुँच कर रंजक पित्त की क्रिया से रागत्व को प्राप्त होता है। वहीं अविकृत निर्मल जो आहार प्रसादाख्य जलीय रस है। वहीं रंजक पित्त से रंजित हो रक्त धातु होती है।

रक्त धातु (Rakta Dhatu) - कार्य, रक्त क्षय, रक्त वृद्धि के लक्षण

रक्त निर्माण के लिए दो तत्वों की आवश्यकता होती है। पहला तत्व अन्नरस जिसमें रक्त निर्माण करने वाले तत्व या रक्त सधर्मी अंश होते हैं। इन्हें आधुनिक के रक्त निर्माण करने वाले तत्व Iron, High class proteins, Vit B12, Follic Acid, Vitamin C आदि हैं।

दूसरा तत्व अग्नि अर्थात् जो अन्न रस में उपस्थित रक्त निर्माण करने वाले तत्वों को अर्थात् अन्नरस में उपस्थित रक्त सधर्मी अंश पर क्रिया कर रक्त में परिवर्तित करते है। आयुर्वेद में इन्हें रंजक तत्व एवं आधुनिक मतानुसार इन्हें Haemopoietic factors (Erythropoietin, intransic factor, hormone like thyroxine, test-osterone, cortisal etc) कह सकते हैं।

आमाशयस्थं तु रसस्य रञ्जनाद्रञ्जनम्। (अ.सं.सू. 20/5)
आमाशयाश्रयाश्रयं पित्तं रञ्जकं रसरंजनात्। (अ. ह. सू. 12/13)

आमाशय को रंजक पित्त का स्थान माना है। यह रंजक पित्त रस को रंजित (रक्त वर्ण) कर रक्त में परिवर्तित करता है।

आधुनिक मतानुसार अन्नरस से रक्त निर्माण में अनेक Factors एवं Enzymes काम करते है। Intransic factor B12 के अवशोषण के लिए आवश्यक है जो आमाशय की Parital cell (Oxyntic cells) से Secrete होता है एवं Vit B1, के अवशोषण में सहायक है एवं इसके बिना RBC का सम्यक् निर्माण संभव नहीं है।

शुद्ध रक्त का लक्षण एवं स्वरूप- शुद्ध रक्त (Oxygenated Blood) चमकीला, लालवर्ण (Scarlet red) एवं असंहत या गाढा (More specific gravity than water) होता है। जिसकी उपमा गुंजाफल, लाल कमल, वीर वहूटी के समान वर्ण से दी गई है। यह तपाये हुए सोने के समान चमकीला रस में किंचिद् मधुर लवण होता है।

तपनीयेन्द्रगोपाभं पद्मालक्तकसंनिभम्।
गुंजाफलसवर्णं च विशुद्धं विद्धि शोणितम्॥ (च. सू. 24/12 )

अर्थात् तपाये हुए सोने, लाल कमल एवं (इन्द्रगोप) (वीर वहूटी) के समान आभा वाला, गुंजाफल के समान वर्ण वाला अर्थात् चमकदार लाल वर्ण वाला (Scarlet Red) विशुद्ध (Oxygenated blood) रक्त होता है।

मधुरं लवणं किञ्चिदशीतोष्णमसंहतम्।
पमेन्द्रगोपहेमाविशशलोहित लोहितम्॥ (अ. हृ. सू. 27/1)

शुद्ध रक्त मीठा, कुछ नमकीन (Alkaline with Ph. 7.4) न शीत, न उष्ण अर्थात् Body temperature के समान, असंहत (गाढा), लाल कमल, वीरवहूटी, सोने के समान आभा वाला एवं खरगोश के रक्त जैसा मानव का रक्त होता है।

इन्द्रगोपकप्रतीकाशमसंहतमविवर्णं च प्रकृतिस्थं जानीयात्। (सु. सू. 14/22)

अर्थात् वीरवहूटी के समान लाल वर्ण वाला, असंहत न बहुत पतला न बहुत गाढा अर्थात् पानी से ज्यादा गाढा, अविकृत वर्ण अर्थात् प्राकृत वर्ण वाला रक्त होता है।

रक्त का संगठन (Composition of Blood)- रक्त पांचभौतिक होता है। आधुनिक मतानुसार रक्त में Plasma एवं Blood cells पायी जाती हैं। Plasma में जल, प्रोटीन, खनिज लवण, विटामिन, पोषक तत्व एवं Boold Cells में RBC, WBC एवं Platelates पायी जाती है, जबकि आयुर्वेद मतानुसार इसका निर्माण पृथ्वी, जल, तेज, वायु एवं आकाश तत्वों के द्वारा होता है किन्तु इसमें आग्नेय अंश की अधिकता के कारण इसे आग्नेय माना है-

विस्रता द्रवता रागः स्पन्दनं लघुता तथा।
भूम्यादीनां गुणा होते दृश्यन्ते चात्र शोणिते। (सु. सू. 14/9)

रक्त में विस्रता, द्रवता, राग, स्पन्दन एवं लघुता पायी जाती है जो पंचमहाभूतों की स्थिति को निम्नलिखित प्रकार से इंगित करते है-

  1. विस्रता (गंध) – पृथ्वी महाभूत का गुण है।
  2. द्रवता – जल महाभूत का गुण है
  3. राग (लालिमा) – तेज महाभूत का गुण है।
  4. स्पन्दन – वायु का गुण है।
  5. लघुता – आकाश का गुण है।

इस प्रकार रक्त पांचभौतिक है।

रक्त का प्रमाण : 8 अंजलि बताया है।

1 अंजलि = 16 तोला अर्थात् 8 अंजलि का मान 128 तोला अर्थात् 1280 ml होता है।

शुद्ध रक्त वाले पुरुष के लक्षण :-

प्रसन्नवर्णेन्द्रियमिन्द्रियार्थानिच्छन्तमव्याहतपक्तृवेगम्।
सुखान्वितं पुष्टि बलोपपन्नं विशुद्धरक्तं पुरुषं वदन्ति ।। (च. सू. 24/24)

जिस व्यक्ति का रक्त शुद्ध होता है। उस व्यक्ति का वर्ण प्राकृत हो अर्थात् श्वेत, पीलापन लिये हुए न हो। इन्द्रियाँ स्वाभाविक शब्द, स्पर्शादि विषयों को ग्रहण करने की इच्छा रखती हो अर्थात्-

  • इन्द्रियों के स्वाभाविक कार्य सम्पन्न होते हैं।
  • पाचन का कार्य सम्यक् प्रकार से होता हो।
  • निरोगी हो, पुष्ट शरीर वाला हो।

ऐसा पुरुष शुद्धरक्त वाला होता है।

रक्त धातु के कार्य

रक्त को जीवन का मूल माना है

देहस्य रुधिरं मूलं रुधिरेणैवधार्य्यते ।
तस्माद्यत्नेन संरक्ष्यं रक्तं जीवं इति स्थितिः ॥ (सु. सू. 14/44)
प्रीणनं जीवनं—————————1 (अ.स.सू. 1/33)

अर्थात् जीवन रक्त के अधीन है। यद्यपि आयुर्वेद में O, का Transport RBC के द्वारा होता है। ऐसा वर्णन नहीं मिलता है किन्तु जीवन रक्त के अधीन है, जो उस बात को जरूर दर्शाता है।

रक्तं वर्णप्रसादं मांसपुष्टिं जीवयति च। (सु. सू. 15/7)

रक्त वर्ण का प्रसादन, मांस की पुष्टि एवं जीवन को बनाये रखता है।

रक्त क्षय

रक्त क्षय के कारण

रक्तक्षय होने के दो प्रमुख कारण है।

1. रक्त का उचित मात्रा में निर्माण न होना अथवा अप्राकृत निर्माण होना एवं RBC शीघ्र ही नष्ट (120 दिन से पूर्व) होना है। ऐसा प्रायः निम्नलिखित अवस्था में होता है।

(अ) कुपोषण – जब अन्नरस या रस धातु की कमी होती है तब न केवल रक्त धातु वल्कि अन्य धातुओं का भी निर्माण नहीं होता अथवा कम होता है।

रसस्तुष्टिं प्रीणनं रक्तपुष्टिं च करोति। (सु. सू. 15/7)

रक्तपुष्टि से तात्पर्य रक्तनिर्माण से ही लेना चाहिए जब रस धातु का निर्माण कम या अनुचित होता है तो रक्तक्षय होता है। आधुनिक मतानुसार Vit B, Folic Acid, Iron, Protein आदि की कमी से रक्तक्षय होता है किन्तु आयुर्वेद मतानुसार रस में तेजांश (रक्त सधर्मी अंश) की कमी से रक्त क्षय होता है।

व्याधियाँ – अनेक व्याधियाँ जैसे कामला, मलेरियादि के कारण RBC अधिक मात्रा में एवं समय से पूर्व नष्ट हो जाती है। अनेक औषधियों के प्रयोग जैसे शंखिया के योग आधुनिक मतानुसार क्लोरोक्यून जैसी औषध भी रक्त क्षय का कारण होती है।

2. रक्त स्राव :-

  • तीव्र रक्त स्राव (Acute Bleeding) जैसे- Accident, surgery आदि
  • चिरकालीन रक्तस्राव- जैसे Bleeding Piles, peptic ulcer etc.

धातुक्षयात् स्रुते रक्ते मंद: संजायतेऽनलः ।
पवनश्च परं कोप याति तस्मात् प्रयत्नतः॥ (सु. सू. 14/37)

रक्तक्षय के लक्षण

जब शरीर में रक्त की कमी होती है तो शरीर का वर्ण श्वेत पीला हो जाता है जिसका ज्ञान मुख्यतः कर्ण (EAR-Lobe), अक्षि (Conjuctiva) मुख (Face), जिह्वा (Tongue), नासा (Nose) ओष्ठ (Lips), पाणितल (Palm), पादतल (Sole), नख (Nails), ललाट (Fore-head), मेहन (Penis), को देखकर करना चाहिये ये प्रायः श्वेत वर्ण एवं रुक्ष होते हैं।

परुषता स्फुटिता म्लानाः त्वग्रक्षा रक्तसंक्षये। (च. सू. 17/65)

रक्त का क्षय होने पर त्वचा परुष (खुरदुरी), स्फुटित (फटी हुई) कान्ति हीन एवं रुक्ष (Dry) होती है।

शोणितक्षये त्वकृपारुष्यमम्लशीतप्रार्थना सिराशैथिल्यं च (सु.सू.15/13 )

  • त्वचा में कठोरता (स्वेद प्रवृत्ति के रुकने के कारण)।
  • अम्ल एवं शीत पदार्थ सेवन की इच्छा।
  • शिराओं में शिथिलता आना (रक्त का Volume कम होने से)।
  • रुक्षता का बढना (स्वेद प्रवृत्ति में कमी)।

रक्तेऽम्लशिशिरप्रीतिसिरा शैथिल्य रुक्षता। (अ. ह. सू. 11/17)

रक्त के क्षीण होने पर अम्ल एवं शीत पदार्थ को खाने की इच्छा होना, सिराओं में शिथिलता एवं रुक्षता (त्वचा, केश एवं नखादि में) होती है।

रक्त वृद्धि के लक्षण

रक्तं विसर्पप्लीहाविद्रधीन्।।
कुष्ठवातास्रपित्तास्र गुल्मोपकुशकामलाः।
व्यङ्गाग्निनाशसम्मोह रक्त त्वङ् नेत्र मूत्रता।। (अ.हृ.सू. 11/8-9)

विसर्प (Erysipelas), प्लीहावृद्धि (Splenomegaly), कुष्ठ (Skin disease), वातरक्त (Gout), रक्तपित्त (Hemohorrage), रक्त गुल्म (Hematoma), उपकुश (Gingivitis), कामला (Jaundice), व्यङ्ग (Hypopigmention of skin) मंदाग्नि (Loss of Appetite), मूर्च्छा (Conciousness) तथा त्वचा, नेत्र, मूत्र में लालिमा रक्त वृद्धि के लक्षण है।

रक्तं रक्ताङ्गाक्षितां सिरा पूर्णत्वं च ।

रक्त की वृद्धि होने पर शरीर के अङ्गावयवों तथा नेत्रों का लाल वर्ण होना तथा शिराओं की पूर्णता होती है। नेत्रों के लालवर्ण से तात्पर्य Conjuctiva का लाल होना एवं शिरापूर्णता से तात्पर्य रक्तचाप बढने (Hypertension) से लेना चाहिए।

रक्तवह स्रोतस्- यकृत एवं प्लीहा को रक्तवह स्रोतस् का मूल माना है।

रक्तवहस्रोतस् की दुष्टि के कारण

विदाहीन्यन्नपानानि स्निग्धोष्णानि द्रवाणि च।
रक्तवाहीनि दुष्यन्ति भजतां चातपानलौ।। (च. वि. 5/14)

  • विदाही अन्न पान का अधिक सेवन (अधिक मिर्च मसाले)।
  • स्निग्ध एवं उष्ण पदार्थ (घृत, तैल की अधिकता वाले एवं चाय, काफी जैसे) द्रव पदार्थों का अति सेवना
  • धूप एवं वायु का अधिक सेवन करने से रक्तवह स्रोतस् की दुष्टि होती है।

आधुनिक मतानुसार रक्तवृद्धि से तात्पर्य RBC की संख्या बढने से लेना चाहिए इसे Polycythemia कहते है।

रक्तवहस्रोतस् की दृष्टि या रक्त प्रदोषज विकार

कुष्ठवीसर्पपिडका रक्तपित्तमसृग्दरः। गुदमेद्रास्यपाकश्च प्लीहा गुल्मोऽथविद्रधि। नीलिका, कामला व्यङ्गं पिप्लवस्तिलकालकाः। ददुश्चर्मदलं श्वित्रं पामाकोष्ठास्रमण्डलम्। रक्त प्रदोषाज्जायन्ते। (च. सू. 28/11-13)

कुष्ठ (Skin disease) विसर्प (Erysiples) पिंडिका, रक्त पित्त (Hemohorrage), असृग्दर (Menorrhgia | or cluster of bleeding disorder), गुदपाक, मेढ्रपाक एवं मुखपाक, प्लीहा वृद्धि (Splenomegaly), गुल्म | (Tumor) विद्रधि (Abcess) नीलिका (Blue discoloration of skin), कामला (Jaundice) व्यङ्ग (Dis | coloration of face) पिप्लु, तिलकालक (Mole) दद्रु (Itching), चर्मदल (Like psoriasis), श्वित्र (Leuco- derma), पामा (Ezema), कोठ एवं रक्तमण्डल रक्त प्रदोषज विकार हैं।

रक्तसार पुरुष के लक्षण –

कर्णाक्षिमुखजिह्वानासौष्ठपाणिपादतलनखललाट मेहन स्निग्ध रक्तवर्णं श्रीमद्भाजिष्णुरक्तसाराणाम् सा सारता सुखमुद्धतां मेधा मनस्वित्वं सौकुमार्यमनतिबलक्लेश सहिष्णुत्वमुष्णत्वमुष्णासहिष्णुत्वं चाचष्टो।। (च. वि. 8/104)

रक्तसार पुरुष के निम्नलिखित लक्षण बताये है-

जिनके कर्ण, आँख, मुख, जिह्वा, नासा, ओष्ठ, पाणिताल, पादतल, ललाट एवं मेहन स्निग्ध, रक्तवर्ण शोभायुक्त एवं चमकदार है। (Ear Lobe, conjuctiva, face, tongue, nose, palms sole, nails, fore head, penis etc looks brightly Red, glistening and attractive).

  • रक्तसार पुरुष सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करने वाला अर्थात् कष्ट को सहन नहीं कर सकता है।
  • बुद्धिमान, मनस्विता, अधिक बलवान न होना।
  • कष्ट एवं ऊष्णता को नहीं सहन करने वाला होता है।

सुश्रुत मतानुसार ऐसा व्यक्ति जिसके नेत्र, नख, तालु, जिह्वा, ओष्ठ, पाणिताल एवं पादतल चिकने एवं ताम्र वर्ण के होते हैं।

रक्त एवं पित्त का परस्पर सम्बन्ध

रक्त एवं पित्त दोनों ही आग्नेय है। इन दोनों में अग्नि की प्रधानता होती है। रक्त आश्रय है एवं पित्त आश्रयी है।

(1) रक्त एवं पित्त के कार्यों में समानता :- दोनों के कार्य एक नहीं किन्तु दोनों के कार्य में बहुत समानता है। त्वचा के वर्ण को कारण रक्त एवं पित्त दोनों है। प्रभा प्रसाद का कारण प्राकृत पित्त एवं रक्त होते हैं।

प्रभा प्रसादो मेधा च पित्तकर्माविकारजम्। (च.सू. 18 /50)
रक्तं वर्ण प्रसादं मांसपुष्टिं च जीवयति। (सु. सू. 15/7)

  • पित्त प्रकृति पुरुष एवं रक्तसार पुरुष दोनों में क्लेश को, न सहन कर पाना, दोनों का लक्षण है।
  • मेधा मनस्विता पित्त एवं रक्त के सामान्य कर्म है।

(2) दोनों की दृष्टि के कारण सामान्य- उष्ण, तीक्ष्ण, कटु, अम्ल, विदाही अन्नपान से रक्त एवं पित्त दोनों वृद्धि होती है।

(3) रक्त एवं पित्त दोनों की वृद्धि के लक्षणों में एकता तो नहीं किन्तु समानता अवश्य

पित्त वृद्धि :- पीत विण्मूत्रनेत्रत्वक् क्षुत्तृड्दाहाल्पनिव्रता। (अ.हृ.सू. 11/7)

बढा हुआ पित्त मल, मूत्र, नेत्र एवं त्वचा में पीलापन, भूख, प्यास, दाह तथा नींद को कम करता है।

रक्त वृद्धि :- रक्तं रक्तांङ्गाङ्क्षितां सिरा पूर्णता च। (सु. सू. 15/19)

शरीर के अंग तथा नेत्रों में लालिमा तथा सिरा में रक्त की अधिकता पाई जाती है।

रक्तं———-————
————————–
———–————रक्त त्वक् नेत्र मूत्रता।। (अ. ह. स. 11/8-9)

  • अर्थात् दोनों की वृद्धि में त्वचा, नेत्र, मूत्र का वर्ण रक्त हो जाता है अर्थात् इनमें लालिमा हो जाती है।
  • चिकित्सा सूत्र भी रक्त एवं पित्त विकारों में समान बताते हुए विरेचन को श्रेष्ठ माना है।

यद्यपि रक्त धातु है एवं पित्त को दोष माना है। सुश्रुत ने तो रक्त को चौथा दोष भी माना है। लेकिन रक्त आश्रय है एवं पित्त आश्रयी यह कहना ही उचित है। रक्त की दुष्टि होने पर पित्त की वृद्धि जैसे लक्षण उत्पन्न होते है एवं पित्त की वृद्धि होने पर रक्त की दुष्टि होती है।

क्या रक्त दोष है

  1. दोष तीन हैं। अगर रक्त को दोष मानते है तो आयुर्वेद के त्रिदोष सिद्धान्त का खण्डन होता है।
  2. सात प्रकार की प्रकृति बताई गई है जो पृथक्-पृथक् तीन, दो दोषों के संयोग से तीन एवं त्रिदोषज इस प्रकार सात प्रकृति मानी है रक्त का कहीं भी प्रकृति निर्माण में नाम निर्दिष्ट नहीं है। अतः रक्त को दोष नहीं माना जा सकता है।
  3. त्रिदोष की निरुक्ति वा गति गन्धनयो, तप संतापे एवं श्लिष आलिंग्ने इस प्रकार वात, पित्त एवं कफ की निरुक्ति बताई हैं किन्तु रक्त की नहीं।
  4. सृष्टि में विसर्ग, आदान, विक्षेप तीन प्रकार की क्रियाएँ होती है जो शरीर में कफ, पित्त एवं वात के द्वारा सम्पन्न होती है। इन्हीं कार्यों को सृष्टि में चन्द्रमा, सूर्य एवं वायु के द्वारा सम्पन्न किया जाता है। रक्त की इस प्रकार की कोई क्रिया का वर्णन वृहत्त्रयी में नहीं मिलता है।

विसर्गादान विक्षेपैः सोमसूर्यानिला तथा।
धारयन्ति जगत् देहं कफ पित्तानिलास्तथा।। (सु. सू. 21/7)

अतः आचार्यों ने रक्त को दोष नहीं माना है किन्तु दोष नहीं मानने से इसकी उपयोगिता कम नहीं होती है क्योंकि –

देहस्य रुधिरं मूलं रुधिरेणैव धार्यते ।
तस्माद् यत्नेन संरक्ष्यं रक्त जीव इति स्थितिः।। (सु. सू. 14/45)

रक्त को शरीर का मूल माना है। इसी से शरीर का धारण होता है अतः प्रयत्न पूर्वक इसकी रक्षा करनी चाहिए क्योंकि जीवन रक्त के अधीन होता है। अतः उक्त सुश्रुत का रक्त का धारण कार्य धातुओं के धारण कार्य से समानता रखता है।

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